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Showing posts from 2020

साल 2020 के नाम ख़त

प्रिय 2020 ,      तुझे हमारा आखरी सलाम। हमारा सफर यहीं तक था ।आज हमारी यह दोस्ती सदा सदा के लिए खत्म हो जाएगी। जब तू आया था तो हमने बहुत अपेक्षाएं की थी तुमसे। सोचा था कुछ नई उपलब्धियां हमारे हाथ लगेगी, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। तूने एक ही झटके में सारी उपलब्धियों को धूमिल कर दिया। तेरी इस छोटी सी जिंदगी( 1जनवरी से 31दिसंबर) में तूने हमें बहुत तड़पाया। कहीं अपनों को तूने एक दूसरे से जुदा कर दिया । सबके दिल में अपने साथी कोरोना का भय बिठा दिया। साथी भी लाया तो कोरोना जैसा लाया । यार, कम से कम दोस्त तो ढंग का लाना था।  किस पर तूने अपना कहर नहीं बरपाया। किसानों को तूने पानी के लिए तरसा दिया था और फिर जब बरसा तो आज भी तेरे ही जीवन काल में किसान सड़कों पर खड़े हैं। विद्यार्थियों को देख ले। कितनी अपेक्षा की थी तुमसे । सोचे थे कि कुछ नई उपलब्धियां हांसिल करेंगे ,परंतु उनके स्कूल कॉलेज भी बंद करवा दिया तूने । पढ़ाई जिसकी वह पूजा करते हैं तूने तो उससे इन की दूरियां बढ़ा दी। बॉलीवुड के नामी सितारे छीन लिए। किसानों के लिए आज भी सर दर्द बना हुआ है। 2 जून की रोटी कमाने वाले मजदूरों...

सरदार पटेल एवं नेहरू

स्वतन्त्रता आन्दोलन में सरदार पटेल का सबसे पहला और बडा योगदान खेडा संघर्ष में हुआ। गुजरात का खेडा खण्ड (डिविजन) उन दिनो भयंकर सूखे की चपेट में था। किसानों ने अंग्रेज सरकार से भारी कर में छूट की मांग की। जब यह स्वीकार नहीं किया गया तो सरदार पटेल, गांधीजी एवं अन्य लोगों ने किसानों का नेतृत्व किया और उन्हे कर न देने के लिये प्रेरित किया। अन्त में सरकार झुकी और उस वर्ष करों में राहत दी गयी। यह सरदार पटेल की पहली सफलता थी। बारडोली कस्बे में सशक्त सत्याग्रह करने के लिये ही उन्हे पहले बारडोली का सरदार और बाद में केवल सरदार कहा जाने लगा। सरदार पटेल 1920 के दशक में गांधीजी के सत्याग्रह आन्दोलन के समय कांग्रेस में भर्ती हुए। 1936 तक उन्हे दो बार कांग्रेस के सभापति बनने का गौरव प्राप्त हुआ। वे पार्टी के अन्दर और जनता में बहुत लोकप्रिय थे। कांग्रेस के अन्दर उन्हे जवाहरलाल नेहरू का प्रतिद्वन्दी माना जाता था। यद्यपि अधिकांश प्रान्तीय कांग्रेस समितियाँ पटेल के पक्ष में थीं, गांधी जी की इच्छा का आदर करते हुए पटेल जी ने प्रधानमंत्री पद की दौड से अपने को दूर रखा और इसके लिये नेहरू का समर्थन किया। उन्हे ...

नीतीश जी का क्या होगा?

बीजेपी-जेडी(यू) गठजोड़ बिहार में सरकार बनाने को तैयार है, उधर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सामने एक विकट स्थिति खड़ी हो गई है- नीतीश कुमार का क्या करें? बिहार जनादेश- भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 74 सीटें जीती हैं, जो 2015 में सिर्फ 53 थीं, जबकि जनता दल (युनाइटेड) की सीटें 71 से घटकर 43 हो गई हैं- पदस्थ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से कहीं ज़्यादा, नरेंद्र मोदी के लिए है. कुछ भी हो, नीतीश की छवि और लोकप्रियता दोनों को धक्का लगा है, एक ऐसा फेक्टर जिसने संभवत: बीजेपी को पीछे खींचा है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) 125 सीटें लेकर, बहुमत के 122 के आंकड़े से आगे निकल चुका है, जबकि आरजेडी-कांग्रेस-वाम महागठबंधन 110 पर रुका दिख रहा है. बिहार में, बीजेपी अब सीनियर सहयोगी के तौर पर उभरकर सामने आई है, और उसकी पीठ पर अब नीतीश कुमार के रूप में, एक थका हुआ नेता सवार है. अब ये कुछ ही समय की बात है, जब पार्टी अपना हक़ जमाएगी और सूबे की कमान अपने हाथ में ले लेगी. नीतीश-हटाओ अभियान के भारी प्रचार के बीच, नीतीश कुमार को गद्दी पर बिठाना, लोगों के गले नहीं उतरेगा. लेकिन इससे जल्दी ही ऐसी स्थिति ज़रूर पैद...

वास्को डी गामा "भारतीय इतिहास का अंधकारमय अध्याय"

क्या सचमुच भारत खोया हुआ था और जिसके बारे में दुनिया कुछ नहीं जानती थी? क्या वास्को डी गामा के पहले भारत में कोई विदेशी नहीं आया था? क्या भारत कोई ऐसी चीज है जिसे खोजा जाए? हजारों वर्ग किलोमीटर के भू भाग को वास्को डी गामा ने खोज लिया। क्या आपको यह हास्यापद नहीं लगता? यह ऐसा ही है कि आप अपने पड़ोसी के घर को खोज लें और दुनिया में इतिहास प्रसिद्ध हो जाएं।   सचमुच यह हद दर्जे की मूर्खता है कि भारतीय बच्चों को यह पढ़ाया जा रहा है कि वास्को डी गामा ने भारत की खोज की। पढ़ाया यह जाना चाहिए कि वास्को डी गामा ने यूरोप को पहली बार भारत तक पहुंचने का समुद्री मार्ग बताया। दरअसल, पहले यूरोपी देशों के लिए भारत एक पहेली जैसा था। यूरोप अरब के देशों से मसाले, मिर्च आदि खरीदता था लेकिन अरब देश के कारोबारी उसे यह नहीं बताते थे कि यह मसाले वह पैदा किस जगह करते हैं। यूरोपीय इस बात को समझ चुके थे कि अरब कारोबारी उनसे जरूर कुछ छुपा रहे हैं।   ये कारोबारी अरब के उस पार पूर्वी देशों से ज्यादा परिचित नहीं थे। जहां तक सवाल भारत का है तो इसके एक ओर हिमालय की ऐसी श्रंखलाएं हैं जिसे पार करना उस दौर में असंभ...

नवरात्रि

नवरात्रि यह उत्सव है        शक्ति की आराधना का                 शक्ति की उपासना का                        9 दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में मां शक्ति के नौ रूपों की आराधना की जाती है जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है ।नवरात्रि शब्द एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'।  इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति की देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है।  शक्ति की देवी मां दुर्गा के अस्त्र हैं:- शंख,चक्र,गदा, कमल,त्रिशूल, तलवार, धनुष बाण, अभय मुद्रा। वसंत की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत,जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है।यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से चला आ रहा है।  नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। पौष, चैत्र, आषाढ, एवं अश्विन मास में प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। परंतु चैत्र नवरात्रि और आश्विन नवरात्र...

गांधी "एक आदर्श विचारधारा"

आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की जन्मतिथि है। आज जब करोना वायरस दुनिया भर में फैल चुका है, और वैज्ञानिक से बचने के लिए वैक्सीन की खोज में लगे हुए हैं। ऐसे वक्त में हमें गांधीजी की कुछ बातों को याद करने की जरूरत है। उन्होंने कहा था- हम ठोकर खा सकते हैं गिर सकते हैं लेकिन फिर उठेंगे। 1918 से लेकर 1920 तक भयंकर स्पेनिश फ्लू का दौर था उन्होंने इसके दौर को झेला है उनकी उस वक्त के कुछ बातें इस तरह से कही थी, जो हमें करोना वायरस से लड़ने के लिए भी प्रेरित करती हैं। गांधीजी कि 7 बातें जानिए कि जब तक वैक्सीन नहीं आ जाता अपने आप को कैसे सुरक्षित रखना है। 1-आप चाहते हैं कि लोग मास्क पहने दूरी बनाए और सफाई रखें लेकिन इसकी शुरुआत आपको स्वयं खुद से करनी होगी। 2- आपको इंसानियत से भरोसा नहीं खोना है इंसानियत एक समुद्र की तरह होती है अगर समुद्र की कुछ बूंदें गंदी हो गई तो इसका मतलब यह नहीं कि समुद्र गंदा हो जाएगा। इसका मतलब यह है कि अगर सब कुछ बुरा ही हो रहा है तो परेशान ना हो सकारात्मक रहे।क्योंकि दुनिया बहुत बड़ी है। अगर कहीं कुछ उथल-पुथल हो भी गई तो ऐसा नहीं कि सब कुछ खत्म हो गया। 3 - स्वास्थ्य ही...

गुस्सा "स्वयं से संघर्ष "

  बंद दुकान में कहीं से घूमता फिरता एक सांप घुस गया।दुकान में रखी एक आरी से टकराकर सांप मामूली सा जख्मी हो गया। घबराहट में सांप ने पलट कर आरी पर पूरी ताक़त से डंक मार दिया जिस कारण उसके मुंह से खून बहना शुरू हो गया। अब की बार सांप ने अपने व्यवहार के अनुसार आरी से लिपट कर उसे जकड़ कर और दम घोंट कर मारने की पूरी कोशिश कर डाली। अब सांप अपने गुस्से की वजह से बुरी तरह घायल हो गया। दूसरेदिन जब दुकानदार ने दुकान खोली तो सांप को आरी से लिपटा मरा हुआ पाया ।जो किसी और कारण से नहीं केवल अपनी तैश और गुस्से की भेंट चढ़ गया था।  कभी कभी गुस्से में हम दूसरों को हानि पहुंचाने की कोशिश करते हैं मगर समय बीतने के  बाद हमें पता चलता है कि हमने अपने आप का ज्यादा नुकसान किया है। सीख - -  अच्छी जिंदगी के लिए कभी कभी हमें, कुछ चीजों को, कुछ लोगों को, कुछ घटनाओं को,कुछ कामों को और कुछ बातों को नजर अन्दाज  करना चाहिए। अपने आपको मानसिक मजबूती के साथ नजरअन्दाज करने का आदी बनाइये।जरूरी नहीं कि हम हर एक्शन का एक रिएक्शन दिखाएं।हमारे कुछ रिएक्शन हमें केवल नुकसान ही नहीं पहुंचाएंगे बल्कि हो सक...

दायित्व

एक लड़का था. अपने गाँव का सबसे होनहार और शिक्षित. पिताजी गर्व से लोगो को बताते फिरते थे कि उनका बेटा देश की रक्षा कर रहा है. अपने गाँव का पहला वर्दीधारी था वो. माँ आधे दिन इंतजार और आधे दिन उसकी बड़ाई में गुजारती थी. उसका एक बचपन का प्यार भी था जिसे उसने पुरे समाज से लड़कर अपनाया था, अग्नि को साक्षी मानकर उसके साथ जीने मरने की कसमें खाया था. लेकिन दूसरी तरफ लड़का, वो तो मातृभूमि के लिए अपना दायित्व निभा रहा था. माँ कहती थी कि जब जब सूरज की किरणें घर की चौखट पर पड़ती है आँखे अपने बच्चें को देखने के लिए उम्मीद बाँधने लगती है. पत्नी जो कभी गुस्सा होती तो कभी प्यार जताती लेकिन मन में डर बनाये रखती थी. पिता जो बेटे के साहस और कर्तव्य पर गर्व से फुले नहीं समाते उनके माथे में भी अख़बारों के पन्नें से आई ख़बरें शिकन ले आती थी. ऐसे ही एक रोज वो अपने घर आया था. बड़ी दिनों के बाद छुट्टियां मिली थी उसे. माँ और पत्नी के लिए साड़ियां लाया था, पिता के पसंद का वही सफ़ेद कुर्ता पैजामा भी याद था उसे. पूरा गाँव उसके स्वागत के लिए खड़ा था, आखिर उस गाँव का असली हीरो जो आया था. एक कंधे में माँ और पत्नी के प्यार और दूस...

चाणक्य "एक अमर व्यक्तित्व"

कौटिल्य अथवा 'चाणक्य' अथवा 'विष्णुगुप्त' (जन्म- अनुमानत: ईसा पूर्व 370, पंजाब; मृत्यु- अनुमानत: ईसा पूर्व 283, पाटलिपुत्र) सम्पूर्ण विश्व में एक महान राजनीतिज्ञ और मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के महामंत्री के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनका व्यक्तिवाचक नाम 'विष्णुगुप्त', स्थानीय नाम 'चाणक्य' (चाणक्यवासी) और गोत्र नाम 'कौटिल्य' (कुटिल से) था। ये चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री थे। चाणक्य का नाम संभवत उनके गोत्र का नाम 'चणक', पिता के नाम 'चणक' अथवा स्थान का नाम 'चणक' का परिवर्तित रूप रहा होगा। चाणक्य नाम से प्रसिद्ध एक नीतिग्रन्थ 'चाणक्यनीति' भी प्रचलित है। तक्षशिला की प्रसिद्धि महान अर्थशास्त्री चाणक्य के कारण भी है, जो यहाँ प्राध्यापक थे और जिन्होंने चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर मौर्य साम्राज्य की नींव डाली। 'मुद्राराक्षस' में कहा गया है कि राजा नन्द ने भरे दरबार में चाणक्य को उसके उस पद से हटा दिया, जो उसे दरबार में दिया गया था। इस पर चाणक्य ने शपथ ली कि वह उसके परिवार तथा वंश को निर्मूल करके नन्द से बदला लेगा।...

नारी सहमति

भले ही आज हिंदुस्तान मंगल तक पहुँच गया हो लेकिन आज भी हिंदुस्तान का पुरुष प्रधान देश संकीर्णताओं से ग्रस्त है। खासकर के महिलाओं के मामलें में। हर विकसित देश विकास को प्राप्त करने के लिए महिलाओं और पुरुषों को कंधे से कन्धा मिलाकर चलने की बात करता है। लेकिन ये सुझाव शायद ही भारत जैसे देश में अपनाए जा सके। यहाँ तो प्राचीन काल से ही स्त्रियों को पुरुषों से कमतर ही समझा गया है जो आज भी विद्यमान है। हमारे देश के संविधान को बने हुए ६७ साल हो चुके है जो सभी देशवासियों को हर प्रकार की स्वतंत्रता देने का वचन तो देता है लेकिन स्त्रियों के मामले में ये संविधान केवल एक पुस्तक मात्र बन कर रह गया है। यूँ तो इसमें स्त्रियों को हर प्रकार की स्वतंत्रता पुरुषों के बराबर दी गयी है परन्तु वास्तविकता क्या है इससे सभी अवगत है। यहाँ स्त्रियाँ सिर्फ वैवाहिक जीवन का सुख भोगने का एक साधन मात्र बन कर रह गयी है। उनका बस एक ही कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है - जीवन पर्यन्त पति और उसके परिवारजनों की सेवा सुशुश्रा करना। जन्म से ही उन्हें स्वयं निर्णय लेने के योग्य समझा ही नहीं जाता। उनका हर निर्णय उनके माता-पिता व भा...

Humanity Biggest Religion

Humanity is the word we hear very often, but little did we know that the word humanity is derived from a Latin word humanitas for “human nature, kindness.” In today’s world of concrete jungle, virtual world where we all are connected by social media nothing seems to touch us, we always feel there is no humanity left. Probably we all are too busy to see through people’s pains and needs. It may be true in few cases, in every day walk of life where we have stopped showing emotions and feelings for small things as we do not have time to pause and look around. Humanity is as small thing as a smile of gratitude; it need not be every time something very big or involve monetary rewards. We may not be giving heed to small things in everyday life but at the same time when human race is hit by some adversity our heart gives out a cry and reaches out for people who are in need. We all try to extend our hand of kindness in different ways by charity, donations sometimes even handing out food package...

It's Done "JAY SHREE RAM"

It's done. Time to sit in silence and introspect over all the great souls who sacrificed themselves for this great milestone of our history. A time to realize what's just happened was a dream for more generations we can care to count and it has come true in our lifetime. Time to pray in silence for days ahead and hope for the best for all the Hindus. We don't need the validation or any permission of the world for expressing our love for our maryada Purushottam. This is a personal moment for each and every Hindu on this planet. A moment of inter joy and peace. A moment of peace before we embark upon our next battle, but battle is not the word for today - today we delve in inner peace and joy.  May Prabhu bestow us with his righteousness and code of ethics. May we not falter from our path of Dharma, may we receive the strength of Prabhu Ram and Martha Sita in our characters Mata Sita and stay forever at his feet. Jai Shri Ram

गुरु की महत्ता

भारत अनंत काल से ऋषियों और मनीषियों की पावन भूमि रहा है जिन्होंने समूचे विश्व और भटकी मानवता का सदैव मार्ग प्रशस्त कर उन्हें सदाचार और सच्चाई की राह दिखाई है | इसकी अध्यात्मिक पृष्ठभूमि ने हर काल में गुरुओं के सम्मान की परम्परा को अक्षुण रखा है | अनादिकाल से ही आमजन से लेकर अवतारों तक के जीवन में गुरुओं का विशेष महत्व रहा है | इसी क्रम में गुरुओं के प्रति सम्मान व्यक्त करने को परमावश्यक माना गया है क्योंकि माता - पिता के बाद यदि कोई व्यक्ति हमारे जीवन को संवारता है तो वह गुरु ही है | इसी लिए गुरु को ब्रह्म ,विष्णु , महेश नहीं बल्कि साक्षात परमब्रह्म की उपाधि दी गई है ------ 'गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा: गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।' अर्थात, गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ। गुरु हमारे भीतर के अन्धकार को मिटा वहां ज्ञान के प्रकाश को भरते हैं | तभी गुरु को अंधकार से प्रकाश की और ले जाने वाला बताया गया है -- अर्थात गु यानि अन्धेरा और रु यानि प्रकाश |  अ...

परीक्षा कक्ष "एक शिक्षक की नजर से"

कितना कठिन समय है वो परीक्षा के 2 घंटे । किसी को बहुत ज्यादा लगते हैं और किसी को बहुत कम।बहुत बार परीक्षा में ड्यूटी दी है मैंने और देखा उन 2 घंटो में विद्यार्थी क्या–क्या हरकतें करते है।जिनको पेपर आता है वो तो बेचारे गर्दन भी नहीं उठा पाते,लगातार लिखते ही रहतें है।बार–बार अतिरिक्त उत्तर पुस्तिका लेते हैं।मगर कुछ ऐसे होते है, जो उनको देख देख कर ये जानने के लिए तड़प रहे होते है की इन्होंने क्या–क्या लिख दिया।    मुझे तो उन बेचारों पर बहुत तरस आता है जो पूरा साल कक्षा में मस्ती मारते हैं और परीक्षा वाले कमरे में बड़ी बेचारी सी शक्ल बनाते है।इधर उधर झांकने की कोशिश करते हैं।उनको ऐसा करने के लिए मना कर दो तो हमे दुश्मन की भांति देख रहे होते है।2 घंटे से पहले उत्तर पुस्तिका वापिस नहीं लेने के फरमान होते है तो उनको 2 घंटे परीक्षा कक्ष में बैठाना पड़ता है और उनकी हरकतों पर ध्यान रखना पड़ता है।        नकल करने के सभी प्रयास जब विफल हो जातें है तो वो परीक्षा कक्ष का बहुत ही बारीकी से अध्ययन करना शुरू कर देते है।पहले शुरुआत पंखे से करते है।देखते है कि कमरे में कितने ...

Be- POSITIVE

उतार चढ़ाव जीवन का हिस्सा है. कभी खुशी, तो कभी गम. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा, जिसे किसी भी तरह की परेशानी न हो. किसी को आर्थिक, किसी को मानसिक, तो कोई शारीरिक परेशानी से जूझ रहा है. जीवन में कभी ऐसे भी क्षण आते हैं, जब लगता है कि अपना सौ प्रतिशत देने के बावजूद रिजल्ट अपेक्षा के अनुरूप नहीं है. बार-बार कोशिश करने के बाद भी परिणाम उत्साहजनक नहीं है. ये किसी भी इंसान के जीवन का सबसे कठिन समय होता है, जब वह न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी टूट जाता है. सवाल यही है कि ऐसे हालात में हम क्या करें? हाल में आपने ये खबर सुनी होगी कि बीसीसीआइ ने महेंद्र सिंह धौनी को अपने कॉन्ट्रैक्ट लिस्ट से बाहर कर दिया है. उसके बाद ये कयास लगने लगे कि बीसीसीआइ ने धौनी को संन्यास लेने के लिए इशारा कर दिया है. उसके अगले ही दिन ये खबर आयी कि धौनी ने रांची के जेएससीए स्टेडियम में प्रैक्टिस शुरू कर दी है. आपको जुलाई 2019 में भारत और न्यूजीलैंड के बीच का सेमीफाइनल मैच याद होगा, जब धौनी के आउट होते ही भारत के वर्ल्डकप जीतने का सपना टूट गया और धौनी जब आंखों में आंसू लिए बाहर जाने लगे, तो पूरा हिंदुस्ता...

ग़रीबी : एक अभिशाप

गरीबी मनुष्य के जीवन में एक मिट्टी की मूर्ति के समान स्थायीत्व और चुपचाप सबकुछ देखकर सहने के लिए मजबूर करती है शायद उसकी यही मजबूरी उसके जिन्दगी के सफर में एक कोढ़ पैदा कर देती है।ईश्वर ने भी मनुष्य को अजीबोगरीब बना दिया है। किसी को ऐसा बनाया है कि वो खाते -खाते मर जाता है कोई खाये बिना मर जाता है। वास्तव में जब कोई गरीबी की मार झेलता है न जाने उसे कैसी -कैसी यातनाएँ झेलनी पड़ती होगी।उसके उपर क्या गुजरती होगी।वो अच्छा कार्य करने के पश्चात् भी किसी के सामने उसमें कहने की हिम्मत नहीं होती उसके अन्दर बहुत सी बातें आती है लेकिन समाज ने ऐसा उसे एक दर्जा प्रदान कर दिया है वो उसी के दायरे में रहकर अपने हर काम को करने के लिए मजबूर हो जाता है।इतना ही नहीं इन गरीबों के प्रति सरकार भी अव्यवहार करती है इनके लिए अलग वर्ग बांट कर दिया गया है। गरीबों के लिए गरीब भोजन गरीबों के लिये गरीब आवास गरीबों के लिए ट्रेनों में गरीब ट्रेन (सामान्य बोगी) बना दी गई।उस ट्रेन में एक तरफ लोगों को बैठने के लिये जगह नहीं मिलता है दूसरी तरफ़ लोग आराम से पैर फैला कर मीठे सपने बुनते सफर करते हैं।एक तरफ लोगों की समस्या के ...

टाइम्स ऑफ लॉकडाउन "मेरी दिनचर्या"

कोविड 19 के चलते पूरी दुनिया में लॉक डाउन हो गया है।पहली बार महसूस हुआ कि दुनिया बहुत छोटी है।     आजकल तो दिनचर्या काफी बदल गयी है।भागदौड़ और हड़बड़ी का स्थान ठहराव और संयम ने ले लिया है।सुबह जल्दी उठने की आदत तो पहले से ही थी पर वह समय पढ़ने - पढ़ाने और अपने स्कूल की और दौड़ने में निकल जाता था। सुबह उठ कर गंगा किनारे पर जा कर वाक करना और  कोयल की मधुर तान सुनना मन को एक अलग ही जहाँ में ले जाता है।चिड़ियों का कलरव, कबूतरों का गुटरगूँ इतने करीब  सांस रोक कर सुनना बहुत सुहाता है।       इस समय नारंगी रंग का सूरज जब अपनी रश्मियों के साथ जब सतरंगी छटा बिखराता है तो अपने तन पर उन ठंडी सी धूप की छुवन का अहसास मन को ही नहीं तन को भी ऊर्जा से भर भर जाता है।           इस बार तो अढ़उल के फूल खूब फूले हैं।पेड़ लाल लाल फूलों से ढके हुए हैं बीच बीच में हरे पत्ते नज़र आते हैं।हो सकता है हर बार अढ़उल खिलते हों पर कभी नज़र नहीं पड़ी उनके सौंदर्य पर। पता है अढ़उल का फूल ऊपर से चटक लाल होता है और अंदर से पीला।उसे देख कर न जाने क्यों मुझे उसमें अपनी परछाई...

जीवन का दर्द

वो एक दिन मेरी डायरी पढ़ने बैठी पहला ही पन्ना पढ़ा और झटके में पांच, छह पन्ने पलट दिए शायद वो दर्द को पीछे छोड़ देना चाहती थी लेकिन उसे अंदाज़ा न था कि वह किनारा छोड़ अंदर सागर की तरफ जा रही है !!

राष्ट्रीय एकता

भारत एक विशाल भूमि का प्रदेश है जिसमें विभिन्न समुदायों, संस्कृतियों और जातियों के लोग रहते हैं। यहाँ सभी प्रांतों के लोगों का एकसाथ रहना लगभग असंभव सा लगता है और इन धार्मिक और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण ही हमारा देश अतीत में अंग्रेजों का गुलाम बन गया था। आज जब हमारा देश स्वतंत्र है तो हमारी पहली और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बाहरी खतरों और आंतरिक असंतोष से इसकी अखंडता और सम्मान को संरक्षित करने की है। राष्ट्रीय एकता न केवल एक मजबूत देश के गठन में मदद करती है बल्कि अपने लोगों के विकास को भी प्रोत्साहित करती है। भारत में 19 नवंबर से 25 नवंबर तक आम जनता के हित में जागरूकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय एकता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय एकता के विचार ने सामाजिक और धार्मिक मतभेदों को नष्ट करने का कार्य भी किया है। इसलिए यदि हमारे देश के लोग एकता के साथ खड़े रहे तो कई सामाजिक मुद्दों को समाप्त किया जा सकता है। विभिन्न विश्वासों को मानने वाले और विभिन्न समुदायों के लोग जो दूसरों के धर्मों से अपने धर्म को अच्छा बताते थे धीरे-धीरे एकता के महत्व को महसूस कर रहे हैं और देश की एकता और सम्...

भ्रष्टाचार

हमारे देश के गठन के बाद से सब कुछ राजनीतिक नेताओं और सरकारी क्षेत्रों में शासन करने वालों द्वारा तय होता है। जाहिर है हम एक लोकतांत्रिक देश हैं लेकिन जो भी सत्ता में आ जाता है वह उस शक्ति का दुरुपयोग करके अपने निजी लाभ के लिए धन और संपत्ति हासिल करने की कोशिश करता है। आम लोग खुद को हमेशा अभाव की स्थिति में पाते हैं। हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच का अंतर इतना बढ़ गया है कि यह हमारे देश में भ्रष्टाचार का एक स्पष्ट उदाहरण है जहां समाज के एक वर्ग के पास समृद्धि और धन है और वहीँ दूसरी तरफ अधिकांश जनता गरीबी रेखा से नीचे रहती है। यही कारण है कि कुछ देशों की अर्थव्यवस्था को गिरावट का सामना करना पड़ रहा है. यदि हम अपने देश के जिम्मेदार नागरिक हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि यह भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्र के आर्थिक विकास में खाई है और हमारे समाज में अपराध को जन्म दे रहा है। यदि हमारे समाज का बहुसंख्यक वर्ग अभाव और गरीबी में रहना जारी रखेगा और किसी भी रोजगार का अवसर नहीं मिलेगा तो अपराध दर कभी कम नहीं होगी। गरीबी लोगों की नैतिकता और मूल्यों को नष्ट कर देगी जिससे लोगों के बीच नफरत में वृद्धि होगी। ...

देशभक्ति

हर गणतंत्र दिवस पर बचपन का एक किस्सा याद आता है. मेरी उम्र लगभग 5 या 6 साल की थी. पहली क्लास में एडमिशन हुए कुछ ही दिन हुए थे और साफ साफ बोलना बस सीखा ही था. गणतंत्र दिवस के अवसर पर सरस्वती शिशु शिक्षा मंदिर में एक कार्यक्रम चल रहा था जिसमें बच्चे जाकर कुछ कुछ सुना रहे थे और उन्हे इनाम मिल रहा था. मैं ये सब देख रहा था. मां ने मुझे कहा कि मैं भी वहां जाऊँ और जाकर कुछ सुनाऊँ. मैं ने पहले तो आनाकानी की लेकिन फिर इनाम के लालच में जाने के लिए तैयार हो गया. माँ ने मुझे उस दिन मेरी ज़िन्दगी की पहली कविता सिखाई. मैं वहां पहुंच गया. प्रबंधक मेरे पड़ोसी ही थे. कुछ देर में मेरा नंबर आ गया और मैं मंच पर था. सामने ढेरों लोग बैठे हुए थे. मैंने अपने हाथों पर कविता लिखी हुई थी, लेकिन हाथों को देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी. कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन फिर मुझे इनाम का ख्याल आया और मैंने कविता शुरू की.  "माँ मुझको बंदूक दिल दो,  मैं भी लड़ने जाऊंगा,  सरहद पर बन कर फौज़ी दुश्मन को मार भगाउँगा" इतना कहने के बाद तालियों की गड़गड़ाहट से सारा मैदान गूंज गया और मैं वहां सन्न सा खड...

शिक्षा का उद्देश्य

विद्यार्थी-जीवन की एक घटना भुलाए नहीं भूलती। हम दसवीं कक्षा में थे। हिंदी के अध्यापक ने शिक्षा के उद्देश्य पर एक लंबा-चौड़ा भाषण दिया। जिला विद्यालय निरीक्षक हमारे कॉलेज का निरीक्षण करनेवाले थे। गुरुजी ने घोषणा की कि कक्षा में जो छात्र शिक्षा के उद्देश्य पर सबसे अच्छा भाषण तैयार करके लाएगा, उसे पुरस्कृत किया जाएगा। सभी छात्र गुरुजी द्वारा बताए जा रहे शिक्षा के उद्देश्यों को नोट करने में व्यस्त थे। गुरुजी कह रहे थे कि शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य बच्चों को एक अच्छा शहरी, भविष्य का एक अच्छा इनसान बनाना है। उन्हें किस तरह समाज और व्यक्तिगत जीवन के बीच नैतिक आधार पर संतुलन स्थापित करना चाहिए तथा हर प्रकार के लोभ, लालच, क्रोध और घृणा की भावनाओं को त्यागकर अन्य लोगों की निस्स्वार्थ सेवा करनी चाहिए, बड़ों का सम्मान और छोटों को प्यार देना चाहिए। गुरुजी का भाषण समाप्त हुआ तो एक छात्र ने अपना हाथ उठाया। सभी को लगा, जैसे कक्षा भर में अकेला छात्र यही है, जिसने गुरुजी द्वारा दिए गए उपदेश को हाथोहाथ कंठस्थ कर लिया है। गुरुजी ने उसकी ओर देखकर संकेत किया— ‘हाँ बेटे! तुम समझे, शिक्षा का उद्देश्य?’ छात्...

कोरोना के बाद की दुनिया

कोरोना वायरस के प्रकोप से जूझ रही दुनिया के बारे में अगर इस वक्त कुछ अनिश्चय कायम हैं तो ऐसी कई नई संभावनाएं भी पैदा हो गई हैं, जिनसे विश्व में कई बदलावों की उम्मीद की जा रही है। अनिश्चय इसका है कि आखिर कैसे यह बीमारी काबू में आएगी और इसके कारण उलट-पुलट व्यवस्थाएं कितने दिनों तक इसी तरह अराजकता की शिकार रहेंगी। संभावनाओं की तरफ गौर करें तो प्रतीत होता है कि इस संक्रमण से संसार कई ऐसे सबक लेगा जो एक बेहतर दुनिया बनाने का भरोसा जगाएंगे और मानवता के वास्तविक प्रतिमान हमारे सामने रखेंगे। मानव व्यवहार और दिनचर्या : महामारियों के इतिहास को देखने से पता चलता है कि जब कोई रोग दुनिया के बड़े फलक पर फैलता है तो वह न केवल लोगों के रहन-सहन को पूरी तरह बदल देता है, बल्कि व्यापार, राजनीति और अर्थव्यवस्थाओं के संचालन के तौर- तरीकों पर भी नाटकीय असर डालता है। कोविड-19 नामक बीमारी यानी कोरोना वायरस के संक्रमण से जो पहली चीज बदलने वाली है, वह सामान्य मानव व्यवहार और हमारी दिनचर्या है। आज यह एक सामान्य मानव व्यवहार है कि लोग अपने घर-परिवार, मित्रों, सहयोगियों और सहयात्रियों के साथ ऐसी दूरी न बरतें, जैसे ...