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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस "एक लेख - शायद एक सोच"

जब भी कोई दिवस मनाया जाता है, हम सभी में लेखक या किसी वक्ता की आत्मा समा जाती है जो हमें लिखने या बोलने के लिये प्रेरित करती है उस विशेष दिवस के उपलक्ष्य में| हमारे समाज में दो तरह के लोग हैं, एक वो जो समीक्षक हैं और दूसरे वो जो प्रोत्साहित करते हैं सराहते हैं, मुझे पता है मेरे इस लेख पर भी दो तरह की राय होगी| इस लेख को पहले भी लिखा जा सकता था या बाद में भी, पर आज लिखना ज्यादा जरुरी इस वजह से है कि इस उपयुक्त समय से ज्यादा संभावना इस बात की है की लोग इसे देखें , पढ़ें और शायद अपनी राय भी दें| क्या केवल 8 मार्च ही वो दिन है जब हमें ज़्यादा उत्सुकता के साथ नारी सशक्तिकरण की बात करनी चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें इनकी महत्ता समझ आनी चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें उन पर गर्व होना चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें समानता की बात करनी चाहिए? फिर भी एक बात अच्छी है कि कम से कम एक दिन तो है gentle reminder की तरह, एक दिन विचार करने के लिये और याद करने के लिये किसी ख़ास घटना को, किसी उत्सव को या किसी उपलब्धि के लिए| किन्तु हम बात करें भारतीय संस्कृति की तो हमारा इतिहास हमें सिखाता है न...