राष्ट्र के नाम अंतिम संबोधन.... मेरे प्यारे देशवासियो, आज मैं फिर लाल किले से बोल रहा हूँ। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले मैं भाषण देता था और देश सुनता था। अब मैं भाषण देता हूँ और देश कमेंट करता है। एक समय था जब मैं बोलता था तो लोग तालियाँ बजाते थे। अब मैं बोलता हूँ तो लोग रील्स बनाते हैं। आधी रात को इंस्टाग्राम पर मेरा मखौल… और मैं देखता रहता हूँ। पहले लोग मेरी बातों पर विश्वास करते थे, फिर शक करने लगे, और अब सीधे मीम बना देते हैं। पहले लोग डरते थे। अब… मैं डरता हूँ। भविष्य के परिणामों का डर। सच्चाई के और खुलने का डर। कि कोई और वीडियो न आ जाये, कोई और हिसाब न माँग ले। मैंने देखी हैं तालियाँ। अब सुनता हूं गालियां। हर तरफ़ उठ रहीं उंगलियाँ। हर तरफ़ अनगिनत सवाल ही सवाल। साथियो, मैंने सोचा था कि इतिहास मुझे लौह पुरुष, विश्वगुरु निर्माता, युगपुरुष, महापुरुष, परमपुरुष - कुछ न कुछ ज़रूर कहेगा। लेकिन इतिहास बड़ी निर्दयी चीज़ निकला। वह अब मुझे ट्रेंडिंग हैशटैग में बदलने पर तुला हुआ है। आज कोई नया जुमला नहीं दूँगा। क्योंकि पुराने जुमले ही अब मेरे पीछे पड़ गये हैं। “अच्छे ...
इस रात की सुबह नहीं होती दिन होता है रात भर रोशनी से चुंधियाई आँखें उबासियाँ लेकर खुलती हैं और बालकनी से सड़क पर युद्धक्षेत्र का आभास होता है रात के अनार आड़े पड़े देखते हैं लड़ियों ने जल कर कैसे फूल की पखुडियाँ बिखेरी हैं कुत्ते जो ना जाने कहाँ गायब रहे सारी रात दबे पाँव सूंघते हैं घटनास्थल को ज़्यादातर घरों में रौशनी की कतारें आखिरी घड़ी की तरह जलती-बुझती रात का धुंआ छत से ठीक ऊपर शामियाने सा, सूरज से कह रहा है थोड़ी देर बाद आना, घर में सब सो रहे हैं गेंदे की गंध में घी मिलाया है रात ने और चासनी तैर रही है नथुनों तक ड्राइंग रूम में रखे कृत्रिम फूलों को मुंह चिढाती इन गेंदों को बहते पानी में जाना है आज नहीं तो कल सारे सबूत मिटाए जाएंगे अपने बालों से बारूद की बू पटाखे के दुकान की रसीद सेंटर टेबल के नीचे की खाली बोतलें और किचन के सिंक में बर्तनों का पहाड़ रहेगी तो बस दरवाज़े पर रंगोली जब तक रहे, शुभ दीपावली का सिंथेटिक झालर जब तक टिके.