Skip to main content

Posts

Showing posts from 2021

साल 2021 के नाम अंतिम खत

प्रिय 2021 ,      तुझे हमारा आखरी सलाम। हमारा सफर यहीं तक था ।आज हमारी यह दोस्ती सदा सदा के लिए खत्म हो जाएगी। जब तू आया था तो हमने बहुत अपेक्षाएं की थी तुमसे। सोचा था कुछ नई उपलब्धियां हमारे हाथ लगेगी, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। तूने एक ही झटके में सारी उपलब्धियों को धूमिल कर दिया। तेरी इस छोटी सी जिंदगी( 1 जनवरी से 31 दिसंबर) में तूने हमें बहुत तड़पाया। कहीं अपनों को तूने एक दूसरे से जुदा कर दिया । सबके दिल में अपने साथी कोरोना का भय बिठा दिया। साथी भी लाया तो कोरोना जैसा लाया । यार, कम से कम दोस्त तो ढंग का लाना था।  किस पर तूने अपना कहर नहीं बरपाया। किसानों को तूने पानी के लिए तरसा दिया था और फिर जब बरसा तो आज भी तेरे ही जीवन काल में किसान सड़कों पर खड़े हैं। विद्यार्थियों को देख ले। कितनी अपेक्षा की थी तुमसे । सोचे थे कि कुछ नई उपलब्धियां हांसिल करेंगे ,परंतु उनके स्कूल कॉलेज भी बंद करवा दिया तूने । पढ़ाई जिसकी वह पूजा करते हैं तूने तो उससे इन की दूरियां बढ़ा दी। बॉलीवुड के नामी सितारे छीन लिए। किसानों के लिए आज भी सर दर्द बना हुआ है। दो जून की रोटी कमाने वाले मजदू...

सलाम कलाम

हमारे देश में एक ऐसी शख्सियत का जन्म हुआ था जिसने राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ दिया है और उनके दिए गए आविष्कारों से आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व उन पर गर्व करता है। उस शख्सियत का नाम है ए.पी.जे. अब्दुल कलाम। विज्ञान के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ देने वाले इस शख्सियत का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ। अब्दुल कलाम मुस्लिम धर्म से थे। उनके पिता का नाम जैनुलअबिदीन था जो नाव चलाते थे और इनकी माता का नाम अशिअम्मा था। अब्दुल कलाम का बचपन बहुत ही संघर्षों में गुजरा। क्योंकि ये गरीब परिवार से थे और ये बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते थे। जिस प्रकार अखबार बांटने के लिए किसी को काम पर रखा जाता है, उसी तरह अब्दुल कलाम भी बचपन में अखबार बांटने जाया करते थे ताकि वो अपने परिवार का खर्च चला सके। उन्होंने रामेश्वरम, रामनाथपुरम के स्च्वात्र्ज मैट्रिकुलेशन स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। अब्दुल कलाम में बचपन से ही कुछ नया सीखने की जिज्ञासा दृढ़ थी। वो पढ़ाई भी करते तो पूरी लग्न और जिज्ञासा से किया करते थे चाहेे उनके पास कैसा भी समय हो। अपनी शिक्षा को...

भूख

  कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश एक भीषण संकट से गुजरा है। दूसरी लहर के कारण लाखों परिवार इस गहरे संकट से प्रभावित हो चुके हैं|हमें ऑक्सीजन,दवाइयों और वैक्सीन की राजनीति के मुद्दे से परे होकर देश के लाखों लोगों के बीच फैली भूखमरी की समस्या पर भी ध्यान देना चाहिए। आइए इस अनजान आपदा से शुरू करते है, और 2020 के मार्च और अप्रैल से इसके अंतर को देखते है।। पिछले साल, भोजन और राशन की कमी बड़ी दिखाई देने वाली समस्या थी। लेकिन यह केवल प्रवासियों तक ही सीमित थी, जिन्हें हम देख सकते थे और जब तक वे बड़े शहरों में थे, हम उन्हें भोजन प्रदान करने में सक्षम थे। जैसे ही वे 100 किमी दूर चले गए, और यहां तक कि गांवों में भी, वे हमारे पहुंच से बाहर हो गए थे। जैसे ही वे अदृश्य हो गए, उनकी जरूरतों को बड़े पैमाने पर सरकारों, एजेंसियों और मीडिया द्वारा अनदेखा कर दिया गया। महामारी की पहली लहर इस बात का सबूत थी कि  देश की आबादी में आधे से अधिक सम्मिलित होने के बावजूद भी भारतीय गांव  विकास  के एजेंडा का हिस्सा नहीं हैं, और यहां तक कि संकट के समय में भी वे बड़े शहरों की जरूरतों के बाद, ही याद ...

मानव विलुप्ति

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ प्रकृति को धरा का आलिंगन करने के पश्चात्‌  प्रेम की अनुभूति हुई, यह अनुभूति इतनी प्रबल और प्रगाढ़ थी कि प्रकृति और धरा फिर कभी अलग न हो पाये, अपने चारों ओर देखें तो हम आज भी उस आलिंगन को देख सकते हैं... भावनाओं में बहने वाली प्रकृति को धरा के रूप में एक स्थिर चित्त साथी मिल गया जिसने न केवल प्रकृति की भावनाओं को स्थिरता प्रदान की अपितु उन्हें स्वयं से बाँध लिया... आज भी इस प्रेम का प्रकर्ष दोनों को एक-दूसरे से बांधे हुये है। प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।  वास्तव में प्रेम की यही परिभाषा है।प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार एक हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।  यही वह अनुभव था, जिससे प्रकृति को मानव सृजन प्रेरणा हुई। ईश्वर ने प्रकृति और धरा के प्रेम क...

AatmaNirbhar Bharat Abhiyan

Someone has rightly said that, “Self- reliance is the only road to true freedom and being one’s own person is its ultimate reward.” This statement indicates that the freedom, which is achieved by the blood, sweat and tears, can only be safeguard by self reliance. And former Prime Minister of India Shri Lal Bahadur Shastri once said, “The preservation of freedom is not the task of soldiers alone. The whole nation has to be strong.” Therefore it’s the moral duty of every Indian citizen to go self reliant. Our government, our people, our scientists and we all have the dream to become superpower of the world one day, which is only possible by becoming self reliant and preserving our freedom which was achieved by our freedom fighters with great sacrifices. The statistics themselves state that India always wanted to be a self-reliant country, without any external support. Our defence sector was very fragile, when we were a newly born independent country. India had a political leadership whic...

भारतीय संस्कृति में मातृत्व दिवस

पाश्चात्य संस्कृति को मानने वाले यूरोप तथा उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के देश़ों में मई महीने के दूसरे रविवार को ‘मातृ दिवस’ अर्थात ‘मदर्स डे’ मनाया जाता है ।  वहाँ की देखादेखी अपने देश में भी मदर्स डे मनाया जाने लगा है । चूँकि पाश्चात्य संस्कृति में परिवार की तुलना में व्यक्ति गत स्वतंत्रता तथा आर्थिक निर्भरता को अधिक महत्व दिया जाता है । इसी कारण वहाँ के अधिकतर लोगों के पास, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष हो, कर्मचारी हो, श्रमिक हो या अधिकारी हो, गाँव का रहने वाला हो या फिर महानगरों का, अपने परिवार के लिए समय का नितांत अभाव होता है ।  वृद्ध माता-पिता की देखभाल का वक्त न बेटों के पास होता है और न ही बहुओं के पास । अत: सामान्य तौर पर वृद्ध जन वृद्धाश्रमों में रहने के लिए विवश होते हैं । बच्चों की देखरेख के लिए आया, झूला घर,बच्चा घर आवासीय विद्यालयों आदि की व्यवस्थायें होती है । चूँकि मानव जीवन में धन तथा भोग विलास के संसाधनों की जितनी आवश्यकता होती है, उतनी ही आवश्यकता परिवार की भी होती है । इसी कारण परिवार नामक संस्था को जीवित रखने के लिए पाश्चात्य देश़ों में मातृ दिवस, प...

सरयू नदी

            " अवधपुरी मम  पुरी   सुहावनी                उत्तर  दिश  बह  सरयू  पावनि " ।  तुलसीदास द्वारा लिखित इस चौपाई में सरयू नदी को अयोध्या की पहचान का प्रमुख प्रतीक बताया गया है । भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर स्थित है । सरयू नदी की कुल लंबाई करीब 160 किमीo है। हिन्दू धर्म में भगवान श्री राम के जन्मस्थान अयोध्या से होकर बहने के कारण इस नदी का विशेष महत्व है । सरयू नदी का वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है ऋग्वेद में देवराज इन्द्र द्वारा दो आर्यों के वध की कथा जिस नदी के तट पर घटी थी वह नदी और कोई नदी नहीं बल्कि सरयू नदी ही थी। रामचरितमानस जो तुलसीदास द्वारा रचित है उसमें तुलसीदास जी ने सरयू नदी का गुणगान भी किया है रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने इसी नदी के जल में अपनी प्रजा , मित्रगणों और भाईयों समेत समाधी ली थी । मत्स्य पुराण के अध्याय 121 और वाल्मीकि रामायण के 24वें सर्ग में सरयू नदी का वर्णन किया गया है कि सरयू नदी भगवान विष्णु के...

अवतारी कृष्ण का संघर्षमय जीवन

जब धार्मिक नायकों की बात आती है, तब मेरे मस्तिष्क में एक साथ कई रेखाएँ खींच जाती हैं। आड़ी-तिरछी, उल्टी-सीधी। उन रेखाओं से कई आकृतियाँ जन्म लेती हैं। कहीं सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखें, कहीं साँवला-सलोना मुख। अधर पर अक्षय मुस्कुराहट। कानों में कभी कुवलय-पुष्प तो कभी स्वर्ण-कुण्डल। श्याम-वर्ण शरीर। उस पर लौकिक पीतांबर। वन-मालाओं से सुशोभित कंठ। गुँजाओं से अंग-प्रत्यंग आभूषित। मोर पंख का मुकुट। ललाट पर घुँघराली अलकें। अधर पर चारु वेणु। यह रूप आयास ही नहीं उभरता। एक पूरा चित्र बनता है। बृज-बिहारी का चित्र। गोपाल-गिरिधारी का चित्र। मोहन-मुरारी का चित्र। कृष्ण का चित्र। तब मेरे समझ में आता है कि इतिहास और पौराणिक कथाओं को किताबों के चंद तहरीरों में बंद करके साक्ष्य बनाया जा सकता हैं, या मिटाया जा सकता हैं। लेकिन उन आस्थाओं का क्या प्रमाण हो सकता है, जो लोगों के रगों में लहू की तरह प्रवाहित होती हैं? आँखों में बिजली की तरह चमकती हैं। कृष्ण भी तो एक आस्था का ही नाम है। एक विश्वास का ही नाम है। भगवान श्रीकृष्ण का लीलामय जीवन अनके प्रेरणाओं व मार्गदर्शन से भरा हुआ है। उन्हें पूर्ण पुरुष लीला अवतार कहा...

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस "एक लेख - शायद एक सोच"

जब भी कोई दिवस मनाया जाता है, हम सभी में लेखक या किसी वक्ता की आत्मा समा जाती है जो हमें लिखने या बोलने के लिये प्रेरित करती है उस विशेष दिवस के उपलक्ष्य में| हमारे समाज में दो तरह के लोग हैं, एक वो जो समीक्षक हैं और दूसरे वो जो प्रोत्साहित करते हैं सराहते हैं, मुझे पता है मेरे इस लेख पर भी दो तरह की राय होगी| इस लेख को पहले भी लिखा जा सकता था या बाद में भी, पर आज लिखना ज्यादा जरुरी इस वजह से है कि इस उपयुक्त समय से ज्यादा संभावना इस बात की है की लोग इसे देखें , पढ़ें और शायद अपनी राय भी दें| क्या केवल 8 मार्च ही वो दिन है जब हमें ज़्यादा उत्सुकता के साथ नारी सशक्तिकरण की बात करनी चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें इनकी महत्ता समझ आनी चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें उन पर गर्व होना चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें समानता की बात करनी चाहिए? फिर भी एक बात अच्छी है कि कम से कम एक दिन तो है gentle reminder की तरह, एक दिन विचार करने के लिये और याद करने के लिये किसी ख़ास घटना को, किसी उत्सव को या किसी उपलब्धि के लिए| किन्तु हम बात करें भारतीय संस्कृति की तो हमारा इतिहास हमें सिखाता है न...

"महाराणा प्रताप" अमर हिन्दू योद्धा

हूँ भूख मरूं‚ हूँ प्यास मरूं‚ मेवाड़ धरा आजाद रहै। हूँ घोर उजाड़ां मैं भटकूँ‚ पण मन में माँ री याद रह्वै”  क्या करें...?? ये मिट्टी ऐसी ही है...इसमें कई जगह अनाज की पैदावार भले ही कम होती होगी पर इस मिट्टी ने देश, सनातन धर्म के लिये, स्व अभिमान के लिये अंतिम क्षण तक लड़ने वाले शुर वीरों को जन्म देने में कभी कमी नहीं की...!! ★  वीर शिरोमणि.. एकलिंग महादेव के भक्त, महाराणा प्रताप 9 मई सन् 1540 को कुम्भलगढ़ किले में इस धरा पर अवतरित हुए थे...उनके  पास नाममात्र की पराधीनता स्वीकार करके शांति से शासन करने का विकल्प था मगर पराधीनता की शांति की तुलना में महाराणा ने स्वाभिमान की अशांति का विकल्प चुना..वह.. माँ भारती के तन पर स्वाभिमान का जेवर था मरते दम तक नहीं झूका वो सूर्यवंश का तेवर था..!! ★ जिस समय महाराणा प्रताप सिंह ने मेवाड़ की गद्दी संभाली, उस समय राजपुताना साम्राज्य बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था। बादशाह अकबर की क्रूरता के आगे राजपुताने के कई नरेशों ने अपने सर झुका लिए थे। कई वीर प्रतापी राज्यवंशों के उत्तराधिकारियों ने अपनी कुल मर्यादा का सम्मान भुलाकर मुगलिया वंश से वैवाहिक ...

कुछ वादे स्वयं से नववर्ष के लिए

नया साल दस्तक देने को है । छोटे कदमों से बेहतरी की ओर बढे। बदलाव की ओर बढ़े । छोटी-छोटी खुशियों को जीना सीखें। नया साल दस्तक देने को है।आपने भी कई संकल्प लिये होंगे या फिर उन पर विचार कर रहे होंगे। लेकिन भारी भरकम वादों और इरादों के फेर में छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज ना करें। आज छोटी छोटी और सरल शुरुआत करें ।जो इस वर्ष आदत बन जाए तो जिंदगी बेहतर मोर्चे पर आगे बढ़ेगी। 1- बीते कुछ महीनों में करोना की आपदा के चलते  जिंदगी ने हमें फिर समझाया है कि- छोटी-छोटी खुशियों को जीना कितना जरूरी है। सेहत सहेजना हो या सकून से अपनी झोली भरना हो ऐसे छोटे छोटे कदम ही बेहतरीन बदलावों की ओर ले जाते हैं। 2 - खुलकर हंसे। जरा ठहरो तो सही,बताओ हंसी कहां गुम हो गई है।इस साल यह तय करने की चेहरे की सुंदरता और खुशियों के इजहार कि इस साथी को फिर जिंदगी में जोड़ेंगे। जी भर से मुस्कुराएंगे जिंदगी की सबसे खूबसूरत नेमत को घर हो या बाहर अपनी पार्टी का हिस्सा बनाएंगे। हंसी खुशी हर हालत में का सामना करेंगे। तकलीफ भरे समय में भी हंसने का बहाना तलाश लेगे। खुद भी मुस्कुराहटों का स्वागत करेंगे और दूसरों को भी इस जिंदादि...