" अवधपुरी मम पुरी सुहावनी
उत्तर दिश बह सरयू पावनि " ।
तुलसीदास द्वारा लिखित इस चौपाई में सरयू नदी को अयोध्या की पहचान का प्रमुख प्रतीक बताया गया है । भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या उत्तर प्रदेश में सरयू नदी के दाएं तट पर स्थित है । सरयू नदी की कुल लंबाई करीब 160 किमीo है। हिन्दू धर्म में भगवान श्री राम के जन्मस्थान अयोध्या से होकर बहने के कारण इस नदी का विशेष महत्व है । सरयू नदी का वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है
ऋग्वेद में देवराज इन्द्र द्वारा दो आर्यों के वध की कथा जिस नदी के तट पर घटी थी वह नदी और कोई नदी नहीं बल्कि सरयू नदी ही थी। रामचरितमानस जो तुलसीदास द्वारा रचित है उसमें तुलसीदास जी ने सरयू नदी का गुणगान भी किया है
रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने इसी नदी के जल में अपनी प्रजा , मित्रगणों और भाईयों समेत समाधी ली थी । मत्स्य पुराण के अध्याय 121 और वाल्मीकि रामायण के 24वें सर्ग में सरयू नदी का वर्णन किया गया है कि सरयू नदी भगवान विष्णु के नेत्रों से प्रकट हुई है । इसे जानने के लिए हमें पौराणिक कथा का सहारा लेना पड़ेगा।
कथा इस प्रकार है -
एक बार की बात है शंकासुर नामक दैत्य ने वेद को चुरा कर समुद्र में डाल दिया और स्वयं भी समुद्र में ही जाकर छिप गया । दैत्य का पीछा करते हुए भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर लिया और समुद्र के तल में चले गए । शंकासुर दैत्य और भगवान विष्णु के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमें शंकासुर दैत्य का वध भगवान विष्णु के हाथों हुआ। समुद्र से वेद निकाल कर भगवान विष्णु ने वेद को ब्रह्मा जी को सौंप दिया और अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए । भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी के लिए यह ब बहुत ही हर्ष का समय था। उसी समय भगवान विष्णु की आंखों से जो अश्रु निकले उसे ब्रह्मा जी ने मानसरोवर में डाल कर सुरक्षित कर लिया। महाराज वैवस्वत ने भगवान विष्णु के अश्रु जो मानसरोवर में सुरक्षित थे उसे अपने बाण के प्रहार से बाहर निकाला । यही अश्रुओं की जलधारा सरयू नदी कहलाई । जब भागीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए माता गंगा को पृथ्वी पर लाए थे तब गंगा और सरयू नदी का संगम हुआ था। सरयू नदी को बौद्ध ग्रंथों में सरभ के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सरयू , घाघरा और शारदा नदियों का भी संगम हुआ है।
वर्तमान में सरयू नदी का उदगम उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले से हुआ है । बहराइच से निकल कर यह नदी गोंडा से होती हुई अयोध्या तक जाती है । पहले यह नदी गोंडा के परसपुर तहसील में पसका नामक तीर्थ स्थल पर घाघरा नदी से मिलती थी लेकिन जब यहाॅं बाॅंध बन गया तब सरयू नदी पसका से करीब आठ किलोमीटर आगे चंदापुर नामक स्थान पर मिलती है । अयोध्या तक यह नदी सरयू नदी के नाम से जानी जाती है लेकिन उसके बाद के क्षेत्रों में यह नदी घाघरा नदी के नाम से जानी जाती हैं । राम की पैड़ी सरयू नदी के ही किनारे है यहां घाट और बगीचों की श्रृंखला हैं । इस नदी पर विभिन्न धार्मिक अवसरों पर भक्तगण स्नान करते हैं ।
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