यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
प्रकृति को धरा का आलिंगन करने के पश्चात् प्रेम की अनुभूति हुई, यह अनुभूति इतनी प्रबल और प्रगाढ़ थी कि प्रकृति और धरा फिर कभी अलग न हो पाये, अपने चारों ओर देखें तो हम आज भी उस आलिंगन को देख सकते हैं...
भावनाओं में बहने वाली प्रकृति को धरा के रूप में एक स्थिर चित्त साथी मिल गया जिसने न केवल प्रकृति की भावनाओं को स्थिरता प्रदान की अपितु उन्हें स्वयं से बाँध लिया... आज भी इस प्रेम का प्रकर्ष दोनों को एक-दूसरे से बांधे हुये है।
प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।
वास्तव में प्रेम की यही परिभाषा है।प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार एक हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।
यही वह अनुभव था, जिससे प्रकृति को मानव सृजन प्रेरणा हुई। ईश्वर ने प्रकृति और धरा के प्रेम को रूप देने का कार्य किया....
आज मनुष्य सारी परिभाषायें बदल रहा है, जीवन के लिये अवश्यक क्षुधा ने आज लोभ का रूप ले लिया है, और लोभ में मानव इस प्रकार लिप्त है कि उसे ना धरा की पुकार सुनायी दे रही है ना ही प्रकृति का विलाप।
स्वयं को सर्व शक्तिमान समझने वाला मानव, दोहन को प्रगति समझने वाला मानव, धन को एक मात्र साधन समझने वाला मानव, आज प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है, ऐसा भ्रम कर बैठा है। आज जनमानस में व्याप्त त्राहि और विनाश या तो मानव स्वयं देखना नहीं चाहता या मानव दृष्टिहीन होने के साथ भावहीन भी हो चुका है।
हमने बचपन में पढ़ा था, "पृथ्वी एक अनोखा ग्रह है, ब्रम्हाण्ड में जीवन मात्र पृथ्वी पर ही सम्भव है", क्या पता था कि हम इसे नष्ट कर, दूसरे ग्रह पर जीवन खोजने की मृगतृष्णा जागृत कर लेंगे... आज मानव लगभग आधी प्राकृतिक सम्पदा नष्ट कर चुका है, यदि इस बिन्दु से वह इसी दिशा में अग्रसर होता है, तो विश्वास कीजिये पश्चात वापसी का कोई मार्ग शेष नहीं रहेगा।
यदि मानव ने भीतर का अंधकार अब नहीं मिटाया, तो प्रकृति की वेदना और ईश्वर का क्रोध मानव को नष्ट कर देगा, यह एक माँ के लिये अपने शिशुओं को खोने जैसा ही होगा, परन्तु ईश्वर को यह कठोर निर्णय लेना होगा और वह अवश्य लेगा। या तो संपूर्ण मानव-जाति नष्ट कर देगा या मुट्ठी भर बचेंगे, पुनः शुरुआत करने के लिये, यदि हममें से कुछ दया के पात्र हुये तो।
आप बताइये आप क्या खोना चाहेंगे,
"पृथ्वी एक अनोखा ग्रह" अथवा "मानव-जाति का विकास"?
निर्णय आपका है।
धरा को हम नष्ट कर सकें, ये हमारी क्षमताओं से परे है।
परन्तु, हम अवश्य नष्ट हो जायेंगे।
विचार कीजिये। कार्य कीजिये। मानव बने रहिये।
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