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मेरी अधूरी कहानी

ढलते दिन का संगीत सुनकर, रखता हूँ राख, बुझते जीवन से चुनकर, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ, एक अधूरी सी कहानी है, जो मनभर गुनगुनाता हूँ!! तारों में लिखी कहानी चुनकर, खिलता हूँ एक आखरी निशानी बनकर, रेत के घरौंदे सा रचता मिटाता हूँ, एक अधूरी सी कहानी है, जो मनभर गुनगुनाता हूँ!! फूलों से टपकी लोरियाँ सुनकर, रखता हूँ नींद से सपने चुनकर, परियों के किस्सों सा जीवन गढ़ता जाता हूँ, एक अधूरी सी कहानी है, जो मनभर गुनगुनाता हूँ!! पुरवाई के झोंकों से झूमकर, रखता हूँ मौजों को सहेज कर, पानी की बूँदों सा बहता जाता हूँ, एक अधूरी सी कहानी है जो मनभर गुनगुनाता हूँ!! रात के अंधेरों से लिपट कर, रखता हूँ तारों को समेट कर, अमावस के चाँद सा खिलता जाता हूँ, एक अधूरी सी कहानी है,जो मनभर गुनगुनाता हूँ!!!

भारतीय संस्कृति में आधुनिकता का बढ़ता प्रभाव

  भारत दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओ में से एक है. हम सभी उस देश से आते हैं जो प्राचीन समय में विश्व गुरु के नाम से जाना जाता था.यह धरती आदि शंकराचार्य , महर्षि वाल्मीकि ,गुरु वशिस्ठ ,कल्हण , शुक्राचार्य , कौटिल्य एवं कलाम जैसे महापुरुषों की धरती रही है. हम सभी को अपनी प्राचीन सभ्यता पर गर्व है एवं इसके के इश्वर का धन्यवाद् है है उन्होंने हमें इस पावन धरा पर जन्म लेने का अवसर प्रदान किया.                इन सब से अलग विश्व के आधुनिकीकरण के कारण हम आज ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ अपनी संस्कृति से जुड़े होने पर व्यक्ति को अनपढ़ अथवा जाहिल समझा जाता है. अपने आप को विदेशी कपड़ो , विदेशी फिल्मों,विदेशी खाने से लोगों ने इसप्रकार जोड़ लिया है की आज उन्हें अपने देश की चीजें केवल एक वस्तु भर नज़र आती है. वे कभी भी अपने आप को इससे जोड़कर देखना नहीं चाहते. हमारे प्राचीन ग्रंथो में बताया गया है की कोई भी पेड़ अपनी जड़ से अलग होकर ज्यादा समय तक हरा भरा नहीं रह सकता परन्तु पता नहीं हम सभी क्यों अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं. ...

नववर्ष में स्वयं से किये वादे

नया साल दस्तक दे चुका है । छोटे कदमों से बेहतरी की ओर बढे। बदलाव की ओर बढ़े । छोटी-छोटी खुशियों को जीना सीखें। नया साल दस्तक देने को है।आपने भी कई संकल्प लिये होंगे या फिर उन पर विचार कर रहे होंगे। लेकिन भारी भरकम वादों और इरादों के फेर में छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज ना करें। आज छोटी छोटी और सरल शुरुआत करें ।जो इस वर्ष आदत बन जाए तो जिंदगी बेहतर मोर्चे पर आगे बढ़ेगी। 1- बीते कुछ महीनों में करोना की आपदा के चलते  जिंदगी ने हमें फिर समझाया है कि- छोटी-छोटी खुशियों को जीना कितना जरूरी है। सेहत सहेजना हो या सकून से अपनी झोली भरना हो ऐसे छोटे छोटे कदम ही बेहतरीन बदलावों की ओर ले जाते हैं। 2 - खुलकर हंसे। जरा ठहरो तो सही,बताओ हंसी कहां गुम हो गई है।इस साल यह तय करने की चेहरे की सुंदरता और खुशियों के इजहार कि इस साथी को फिर जिंदगी में जोड़ेंगे। जी भर से मुस्कुराएंगे जिंदगी की सबसे खूबसूरत नेमत को घर हो या बाहर अपनी पार्टी का हिस्सा बनाएंगे। हंसी खुशी हर हालत में का सामना करेंगे। तकलीफ भरे समय में भी हंसने का बहाना तलाश लेगे। खुद भी मुस्कुराहटों का स्वागत करेंगे और दूसरों को भी इस जिंदादि...

साल 2021 के नाम अंतिम खत

प्रिय 2021 ,      तुझे हमारा आखरी सलाम। हमारा सफर यहीं तक था ।आज हमारी यह दोस्ती सदा सदा के लिए खत्म हो जाएगी। जब तू आया था तो हमने बहुत अपेक्षाएं की थी तुमसे। सोचा था कुछ नई उपलब्धियां हमारे हाथ लगेगी, परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। तूने एक ही झटके में सारी उपलब्धियों को धूमिल कर दिया। तेरी इस छोटी सी जिंदगी( 1 जनवरी से 31 दिसंबर) में तूने हमें बहुत तड़पाया। कहीं अपनों को तूने एक दूसरे से जुदा कर दिया । सबके दिल में अपने साथी कोरोना का भय बिठा दिया। साथी भी लाया तो कोरोना जैसा लाया । यार, कम से कम दोस्त तो ढंग का लाना था।  किस पर तूने अपना कहर नहीं बरपाया। किसानों को तूने पानी के लिए तरसा दिया था और फिर जब बरसा तो आज भी तेरे ही जीवन काल में किसान सड़कों पर खड़े हैं। विद्यार्थियों को देख ले। कितनी अपेक्षा की थी तुमसे । सोचे थे कि कुछ नई उपलब्धियां हांसिल करेंगे ,परंतु उनके स्कूल कॉलेज भी बंद करवा दिया तूने । पढ़ाई जिसकी वह पूजा करते हैं तूने तो उससे इन की दूरियां बढ़ा दी। बॉलीवुड के नामी सितारे छीन लिए। किसानों के लिए आज भी सर दर्द बना हुआ है। दो जून की रोटी कमाने वाले मजदू...

सलाम कलाम

हमारे देश में एक ऐसी शख्सियत का जन्म हुआ था जिसने राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ दिया है और उनके दिए गए आविष्कारों से आज भारत ही नहीं बल्कि पूरा विश्व उन पर गर्व करता है। उस शख्सियत का नाम है ए.पी.जे. अब्दुल कलाम। विज्ञान के क्षेत्र में हमें बहुत कुछ देने वाले इस शख्सियत का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ। अब्दुल कलाम मुस्लिम धर्म से थे। उनके पिता का नाम जैनुलअबिदीन था जो नाव चलाते थे और इनकी माता का नाम अशिअम्मा था। अब्दुल कलाम का बचपन बहुत ही संघर्षों में गुजरा। क्योंकि ये गरीब परिवार से थे और ये बचपन से ही पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करते थे। जिस प्रकार अखबार बांटने के लिए किसी को काम पर रखा जाता है, उसी तरह अब्दुल कलाम भी बचपन में अखबार बांटने जाया करते थे ताकि वो अपने परिवार का खर्च चला सके। उन्होंने रामेश्वरम, रामनाथपुरम के स्च्वात्र्ज मैट्रिकुलेशन स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। अब्दुल कलाम में बचपन से ही कुछ नया सीखने की जिज्ञासा दृढ़ थी। वो पढ़ाई भी करते तो पूरी लग्न और जिज्ञासा से किया करते थे चाहेे उनके पास कैसा भी समय हो। अपनी शिक्षा को...

भूख

  कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश एक भीषण संकट से गुजरा है। दूसरी लहर के कारण लाखों परिवार इस गहरे संकट से प्रभावित हो चुके हैं|हमें ऑक्सीजन,दवाइयों और वैक्सीन की राजनीति के मुद्दे से परे होकर देश के लाखों लोगों के बीच फैली भूखमरी की समस्या पर भी ध्यान देना चाहिए। आइए इस अनजान आपदा से शुरू करते है, और 2020 के मार्च और अप्रैल से इसके अंतर को देखते है।। पिछले साल, भोजन और राशन की कमी बड़ी दिखाई देने वाली समस्या थी। लेकिन यह केवल प्रवासियों तक ही सीमित थी, जिन्हें हम देख सकते थे और जब तक वे बड़े शहरों में थे, हम उन्हें भोजन प्रदान करने में सक्षम थे। जैसे ही वे 100 किमी दूर चले गए, और यहां तक कि गांवों में भी, वे हमारे पहुंच से बाहर हो गए थे। जैसे ही वे अदृश्य हो गए, उनकी जरूरतों को बड़े पैमाने पर सरकारों, एजेंसियों और मीडिया द्वारा अनदेखा कर दिया गया। महामारी की पहली लहर इस बात का सबूत थी कि  देश की आबादी में आधे से अधिक सम्मिलित होने के बावजूद भी भारतीय गांव  विकास  के एजेंडा का हिस्सा नहीं हैं, और यहां तक कि संकट के समय में भी वे बड़े शहरों की जरूरतों के बाद, ही याद ...

मानव विलुप्ति

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ प्रकृति को धरा का आलिंगन करने के पश्चात्‌  प्रेम की अनुभूति हुई, यह अनुभूति इतनी प्रबल और प्रगाढ़ थी कि प्रकृति और धरा फिर कभी अलग न हो पाये, अपने चारों ओर देखें तो हम आज भी उस आलिंगन को देख सकते हैं... भावनाओं में बहने वाली प्रकृति को धरा के रूप में एक स्थिर चित्त साथी मिल गया जिसने न केवल प्रकृति की भावनाओं को स्थिरता प्रदान की अपितु उन्हें स्वयं से बाँध लिया... आज भी इस प्रेम का प्रकर्ष दोनों को एक-दूसरे से बांधे हुये है। प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।  वास्तव में प्रेम की यही परिभाषा है।प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार एक हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।  यही वह अनुभव था, जिससे प्रकृति को मानव सृजन प्रेरणा हुई। ईश्वर ने प्रकृति और धरा के प्रेम क...