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Showing posts from June, 2021

भूख

  कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश एक भीषण संकट से गुजरा है। दूसरी लहर के कारण लाखों परिवार इस गहरे संकट से प्रभावित हो चुके हैं|हमें ऑक्सीजन,दवाइयों और वैक्सीन की राजनीति के मुद्दे से परे होकर देश के लाखों लोगों के बीच फैली भूखमरी की समस्या पर भी ध्यान देना चाहिए। आइए इस अनजान आपदा से शुरू करते है, और 2020 के मार्च और अप्रैल से इसके अंतर को देखते है।। पिछले साल, भोजन और राशन की कमी बड़ी दिखाई देने वाली समस्या थी। लेकिन यह केवल प्रवासियों तक ही सीमित थी, जिन्हें हम देख सकते थे और जब तक वे बड़े शहरों में थे, हम उन्हें भोजन प्रदान करने में सक्षम थे। जैसे ही वे 100 किमी दूर चले गए, और यहां तक कि गांवों में भी, वे हमारे पहुंच से बाहर हो गए थे। जैसे ही वे अदृश्य हो गए, उनकी जरूरतों को बड़े पैमाने पर सरकारों, एजेंसियों और मीडिया द्वारा अनदेखा कर दिया गया। महामारी की पहली लहर इस बात का सबूत थी कि  देश की आबादी में आधे से अधिक सम्मिलित होने के बावजूद भी भारतीय गांव  विकास  के एजेंडा का हिस्सा नहीं हैं, और यहां तक कि संकट के समय में भी वे बड़े शहरों की जरूरतों के बाद, ही याद ...

मानव विलुप्ति

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥ प्रकृति को धरा का आलिंगन करने के पश्चात्‌  प्रेम की अनुभूति हुई, यह अनुभूति इतनी प्रबल और प्रगाढ़ थी कि प्रकृति और धरा फिर कभी अलग न हो पाये, अपने चारों ओर देखें तो हम आज भी उस आलिंगन को देख सकते हैं... भावनाओं में बहने वाली प्रकृति को धरा के रूप में एक स्थिर चित्त साथी मिल गया जिसने न केवल प्रकृति की भावनाओं को स्थिरता प्रदान की अपितु उन्हें स्वयं से बाँध लिया... आज भी इस प्रेम का प्रकर्ष दोनों को एक-दूसरे से बांधे हुये है। प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।  वास्तव में प्रेम की यही परिभाषा है।प्रकृति और धरा दो पूर्णतः भिन्न स्वभाव के होते हुये भी, इसप्रकार एक हुये की दोनों में किसी एक के न होने पर दूसरा स्वयं नष्ट हो जाएगा।  यही वह अनुभव था, जिससे प्रकृति को मानव सृजन प्रेरणा हुई। ईश्वर ने प्रकृति और धरा के प्रेम क...