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Showing posts from May, 2020

ग़रीबी : एक अभिशाप

गरीबी मनुष्य के जीवन में एक मिट्टी की मूर्ति के समान स्थायीत्व और चुपचाप सबकुछ देखकर सहने के लिए मजबूर करती है शायद उसकी यही मजबूरी उसके जिन्दगी के सफर में एक कोढ़ पैदा कर देती है।ईश्वर ने भी मनुष्य को अजीबोगरीब बना दिया है। किसी को ऐसा बनाया है कि वो खाते -खाते मर जाता है कोई खाये बिना मर जाता है। वास्तव में जब कोई गरीबी की मार झेलता है न जाने उसे कैसी -कैसी यातनाएँ झेलनी पड़ती होगी।उसके उपर क्या गुजरती होगी।वो अच्छा कार्य करने के पश्चात् भी किसी के सामने उसमें कहने की हिम्मत नहीं होती उसके अन्दर बहुत सी बातें आती है लेकिन समाज ने ऐसा उसे एक दर्जा प्रदान कर दिया है वो उसी के दायरे में रहकर अपने हर काम को करने के लिए मजबूर हो जाता है।इतना ही नहीं इन गरीबों के प्रति सरकार भी अव्यवहार करती है इनके लिए अलग वर्ग बांट कर दिया गया है। गरीबों के लिए गरीब भोजन गरीबों के लिये गरीब आवास गरीबों के लिए ट्रेनों में गरीब ट्रेन (सामान्य बोगी) बना दी गई।उस ट्रेन में एक तरफ लोगों को बैठने के लिये जगह नहीं मिलता है दूसरी तरफ़ लोग आराम से पैर फैला कर मीठे सपने बुनते सफर करते हैं।एक तरफ लोगों की समस्या के ...

टाइम्स ऑफ लॉकडाउन "मेरी दिनचर्या"

कोविड 19 के चलते पूरी दुनिया में लॉक डाउन हो गया है।पहली बार महसूस हुआ कि दुनिया बहुत छोटी है।     आजकल तो दिनचर्या काफी बदल गयी है।भागदौड़ और हड़बड़ी का स्थान ठहराव और संयम ने ले लिया है।सुबह जल्दी उठने की आदत तो पहले से ही थी पर वह समय पढ़ने - पढ़ाने और अपने स्कूल की और दौड़ने में निकल जाता था। सुबह उठ कर गंगा किनारे पर जा कर वाक करना और  कोयल की मधुर तान सुनना मन को एक अलग ही जहाँ में ले जाता है।चिड़ियों का कलरव, कबूतरों का गुटरगूँ इतने करीब  सांस रोक कर सुनना बहुत सुहाता है।       इस समय नारंगी रंग का सूरज जब अपनी रश्मियों के साथ जब सतरंगी छटा बिखराता है तो अपने तन पर उन ठंडी सी धूप की छुवन का अहसास मन को ही नहीं तन को भी ऊर्जा से भर भर जाता है।           इस बार तो अढ़उल के फूल खूब फूले हैं।पेड़ लाल लाल फूलों से ढके हुए हैं बीच बीच में हरे पत्ते नज़र आते हैं।हो सकता है हर बार अढ़उल खिलते हों पर कभी नज़र नहीं पड़ी उनके सौंदर्य पर। पता है अढ़उल का फूल ऊपर से चटक लाल होता है और अंदर से पीला।उसे देख कर न जाने क्यों मुझे उसमें अपनी परछाई...

जीवन का दर्द

वो एक दिन मेरी डायरी पढ़ने बैठी पहला ही पन्ना पढ़ा और झटके में पांच, छह पन्ने पलट दिए शायद वो दर्द को पीछे छोड़ देना चाहती थी लेकिन उसे अंदाज़ा न था कि वह किनारा छोड़ अंदर सागर की तरफ जा रही है !!