राष्ट्र के नाम अंतिम संबोधन....
मेरे प्यारे देशवासियो,
आज मैं फिर लाल किले से बोल रहा हूँ।
फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले मैं भाषण देता था और देश सुनता था।
अब मैं भाषण देता हूँ और देश कमेंट करता है।
एक समय था जब मैं बोलता था तो लोग तालियाँ बजाते थे।
अब मैं बोलता हूँ तो लोग रील्स बनाते हैं।
आधी रात को इंस्टाग्राम पर मेरा मखौल…
और मैं देखता रहता हूँ।
पहले लोग मेरी बातों पर विश्वास करते थे, फिर शक करने लगे, और अब सीधे मीम बना देते हैं।
पहले लोग डरते थे।
अब… मैं डरता हूँ।
भविष्य के परिणामों का डर।
सच्चाई के और खुलने का डर।
कि कोई और वीडियो न आ जाये, कोई और हिसाब न माँग ले।
मैंने देखी हैं तालियाँ।
अब सुनता हूं गालियां।
हर तरफ़ उठ रहीं उंगलियाँ।
हर तरफ़ अनगिनत सवाल ही सवाल।
साथियो,
मैंने सोचा था कि इतिहास मुझे लौह पुरुष, विश्वगुरु निर्माता, युगपुरुष, महापुरुष, परमपुरुष - कुछ न कुछ ज़रूर कहेगा।
लेकिन इतिहास बड़ी निर्दयी चीज़ निकला।
वह अब मुझे ट्रेंडिंग हैशटैग में बदलने पर तुला हुआ है।
आज कोई नया जुमला नहीं दूँगा।
क्योंकि पुराने जुमले ही अब मेरे पीछे पड़ गये हैं।
“अच्छे दिन” कहो तो लोग हँसते हैं।
“विश्वगुरु” कहो तो लोग मीम बनाते हैं।
भाइयो-बहनो,
पिछले दिनों कुछ युवाओं ने बड़ी बदतमीज़ी की।
उन्हें डरना चाहिये था।
वे हँसने लगे।
उन्हें चुप रहना चाहिये था।
वे सवाल पूछने लगे।
उन्हें धन्यवाद देना चाहिये था।
वे हिसाब माँगने लगे।
यह लोकतंत्र की परम्परा के विरुद्ध है।
मैंने वर्षों तक आपको बताया कि सब कुछ शानदार है।
लेकिन कुछ लोगों ने आँकड़े देख लिये।
कुछ लोगों ने बिल देख लिये।
कुछ लोगों ने चंदे का हिसाब माँग लिया।
और कुछ लोगों ने तो नाटक तक कर दिया।
साथियो,
मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझसे भूल हुई।
मैंने सोचा था कि बेरोज़गार युवा नौकरी माँगेंगे।
उन्होंने जवाबदेही माँग ली।
मैंने सोचा था कि वे धर्म और जाति में उलझे रहेंगे।
उन्होंने भविष्य की बात शुरू कर दी।
मैंने सोचा था कि वे डरेंगे।
लेकिन वे हँस पड़े।
और जनता की हँसी से अधिक भयानक कोई ध्वनि नहीं होती।
मेरे देशवासियो,
आज मैं कोई नया सपना नहीं बेचूँगा।
गोदाम लगभग खाली हो चुका है।
नये जुमले बनाने वाले विशेषज्ञ भी अब इस्तीफ़े की सोच रहे हैं।
मैं सिर्फ़ इतना कहूँगा-
अगर आने वाले दिनों में कोई और घोटाला निकल आये,
कोई और वीडियो आ जाये, कोई और फ़ाइल खुल जाये,
तो कृपया उसे राष्ट्रहित में ही देखें।
और यदि फिर भी कुछ न बचे-
तो कम से कम इतना याद रखियेगा कि
मैंने कोशिश बहुत की थी...
सच्चाई से नहीं,
उसकी पैकेजिंग से लड़ने की।
जय... (कुछ क्षण का मौन)
ख़ैर,
जो भी बचा हो उसकी जय।
धन्यवाद।
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