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अंतराष्ट्रीय महिला दिवस "एक लेख - शायद एक सोच"

जब भी कोई दिवस मनाया जाता है, हम सभी में लेखक या किसी वक्ता की आत्मा समा जाती है जो हमें लिखने या बोलने के लिये प्रेरित करती है उस विशेष दिवस के उपलक्ष्य में|

हमारे समाज में दो तरह के लोग हैं, एक वो जो समीक्षक हैं और दूसरे वो जो प्रोत्साहित करते हैं सराहते हैं, मुझे पता है मेरे इस लेख पर भी दो तरह की राय होगी|

इस लेख को पहले भी लिखा जा सकता था या बाद में भी, पर आज लिखना ज्यादा जरुरी इस वजह से है कि इस उपयुक्त समय से ज्यादा संभावना इस बात की है की लोग इसे देखें , पढ़ें और शायद अपनी राय भी दें|

क्या केवल 8 मार्च ही वो दिन है जब हमें ज़्यादा उत्सुकता के साथ नारी सशक्तिकरण की बात करनी चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें इनकी महत्ता समझ आनी चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें उन पर गर्व होना चाहिए? क्या सिर्फ आज ही के दिन हमें समानता की बात करनी चाहिए? फिर भी एक बात अच्छी है कि कम से कम एक दिन तो है gentle reminder की तरह, एक दिन विचार करने के लिये और याद करने के लिये किसी ख़ास घटना को, किसी उत्सव को या किसी उपलब्धि के लिए|

किन्तु हम बात करें भारतीय संस्कृति की तो हमारा इतिहास हमें सिखाता है नारी का सम्मान करना और समानता का भाव रखना|बिना नारी हम इस समाजकी कल्पना मात्र भी नहीं कर सकते| प्राचीन भारत ने हमेशा नारी शक्ति और साहस की प्रसंशा की है|

हमें अभी भी जरुरत है सोचने की, नारी सशक्तिकरण के विषय में| इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में समाज में कुछ सुधार हुए हैं नारी सशक्तिकरण के लिए, समाज के दृष्टिकोण में बदलाव आया है, हम आप में भी कुछ सुधार हुआ है लेकिंन अभी भी हम अपने आप को इतना बेहतर नहीं बना पाए हैं कि एक स्तंभ स्थापित कर सकें और दम्भ भर सकें, क्योंकि जब भी कोई सवाल या मुद्दा उठता है और हमारी परिपक्वता की परीक्षा की घड़ी आती है तो हम अपनी अपनी राय और तर्क- कुतर्क में व्यस्त हो जाते हैं|

भारत उन विरले देशों में से है जहाँ नारी को पूजा जाता है- देवी के रूप में| हमारे प्राचीन पथप्रदर्शक जानते थे नारी की महत्ता और महानता को|मुझे उम्मीद है कि आप लोग इस बात का आभास नहीं लगाएंगे कि मैं किसी धर्म विशेष की बात कर रहा हूँ, नारी सशक्तिकरण का किसी धर्म विशेष से कोई लेना देना नहीं है, ये उदाहरण अपनी बात को केवल सही तरीके से रखने के लिए है|

"सीता जी", श्री राम की पत्नी, प्रतीक हैं त्याग और साहस का, "रानी लक्ष्मी बाई", प्रतीक हैं साहस का, बुराई के खिलाफ लड़ने का और ऐसे अनेकों उदाहरण हैं आज के युग से भी पर अगर मैं सबके नाम लिखने लग जाऊं तो शायद ही इस लेख में जगह बचे कुछ लिखने के लिए, जिन्होंने राह दिखाई है और प्रतीक बनीं हैं समाज में सशक्तिकरण का|

अक्सर हम बात करते हैं कि सिर्फ नारी ही क्यों त्याग करे? पर हम जानते हैं कि दोनों ही त्याग करते हैं; एक सैनिक त्याग करता है अपनी खुशियों का, परिवार के साथ न होकर देश की सेवा के लिए, एक चिकित्सक त्याग करता है अपने उस बचे समय का, जो उसे परिवार को देना है मरीजों की सेवा और जान बचाने के लिए, एक साधारण व्यक्ति जो कुछ पैसे कमाने अपने घर से दूर किसी अन्य शहर या देश में रहता है उस एहसास और ख़ुशी से वंचित जो उसे मिलती अपने बच्चे को बड़ा होता देख | ये सारी बात एक नारी के साथ भी है, जब हम समानता की बात करते हैं तो हमें दोनों ही पहलुओं पर विचार करना है|

समय है कि हम लड़कियों की भी वैसी ही परवरिश करें जैसी हम लडक़ों की करते हैं, हम लड़कियों की शिक्षा पर खर्च करें न कि उस पूँजी को जमा करें उनकी शादी के लिए| हमें लड़कियों के भविष्य के लिए भी वही सोच रखनी होगी जो हम लड़कों के लिए रखते हैं| हम लड़कों की शादी के लिए कभी पूंजी जमा नहीं करते क्योंकि हमारी ऐसी सोच है कि लड़के को पढ़ा लिखा कर काबिल बना दें और कमाने लायक बना दें ताकि वे अपना भविष्य बना सकें, तो ऐसी सोच हम लड़कियों के लिए क्यों नहीं रख सकते? 

हमारी सोच ऐसी ही बनी हुई है बहुत वर्षों से, हम हमेशा असुरक्षित महसूस करते हैं लड़कियों के भविष्य के लेकर, उनके अपने पैरों पर खड़ा होने को लेकर, उनके रोजगार को लेकर, जीवन के निर्णय को लेकर, हम ये नहीं जानते कि वे क्या चाहती हैं अपने भविष्य से | हमारी ये असुरक्षा की भावना शुरु से उन्हें कमजोर बनाती चली जाती है, हम खुद उनके लिए ऐसा वातावरण ऐसा माहौल उनके लिये बना देते हैं जो समाज में लड़के और लड़िकयों की समानता में भिन्नता को जन्म देती है|

पर अगर हम तैयार हैं उस सोच को अपनाने के लिए, तो हम दहेज़ रुपी राक्षस को भी समाज से समाप्त कर सकते हैं बहुत जल्द तो नहीं पर पूरी तरह|

हम सभी को निर्णय लेना होगा भविष्य को बदलने के लिए, जो कि बेहतर हो सकता है, जैसा हम चाहते हैं उससे भी बेहतर| कोई भी दिवस एक gentle reminder है हमारी सोच को उम्दा बनाने का और जीवन को बेहतर और खुशियों से भरा बनाने का|

हम दिवाली, ईद, होली और क्रिसमस मनाते हैं, निःसंदेह इनके पीछे हमारी धार्मिक मान्यता और आस्था है, पर एक ऐसी वजह जो इन सारे त्योहारों में अवसरों में common है वो वजह है "ख़ुशी, उल्लास,जीवंतता", ये हमें एक दूसरे के करीब लाती है, किसी भी त्यौहार या दिवस पर हम हमारे मित्रों, जानने वालों के घर जाते हैं, उन्हें अपने घर आमन्त्रित करते हैं या एक जगह इकठ्ठा होते हैं, अपनी खुशियों को साझा करते हैं,उत्सव मानते हैं,एक दूसरे की ख़ुशी में शामिल होते हैं और कभी कभी तो अनजान लोगों के साथ भी खुशियां बांटते हैं, हम उस विशेष उपलक्ष्य पर बहुत विनम्र होते हैं, खुश होते हैं और मिलनसार होते हैं, बाकी जीवन के और दिनों कि अपेक्षा, चाहे वो दिवाली हो , ईद हो या क्रिसमस हो या अन्य कोई विशेष दिन| अगर 

हम वही व्यवहार और व्यक्तित्व जीवन के और दिनों में भी अपने अंदर ले आएं, उसी विनम्रता के साथ सकारात्मकता लाएं अपने नज़रिये में हर सोच के लिए, जो कि ज़रूरी है और सही भी, तो सिर्फ ८ मार्च ही नहीं होगा वो एक दिन समर्पित करने के लिए नारी के अस्तित्व को|क्योंकि अगर उसकाअस्तित्व नहीं है तो इस विश्व का भी कोई अस्तित्व नहीं|


मेरा सलाम है, समूचे नारी जगत को, एक माँ को, एक बहन को, एक बेटी को, एक संगिनी को

Happy international women's day

Comments

  1. बहुत अच्छे एवं शिक्षाप्रद लेख

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