जब धार्मिक नायकों की बात आती है, तब मेरे मस्तिष्क में एक साथ कई रेखाएँ खींच जाती हैं। आड़ी-तिरछी, उल्टी-सीधी। उन रेखाओं से कई आकृतियाँ जन्म लेती हैं। कहीं सुन्दर बड़ी-बड़ी आँखें, कहीं साँवला-सलोना मुख। अधर पर अक्षय मुस्कुराहट। कानों में कभी कुवलय-पुष्प तो कभी स्वर्ण-कुण्डल। श्याम-वर्ण शरीर। उस पर लौकिक पीतांबर। वन-मालाओं से सुशोभित कंठ। गुँजाओं से अंग-प्रत्यंग आभूषित। मोर पंख का मुकुट। ललाट पर घुँघराली अलकें। अधर पर चारु वेणु। यह रूप आयास ही नहीं उभरता। एक पूरा चित्र बनता है। बृज-बिहारी का चित्र। गोपाल-गिरिधारी का चित्र। मोहन-मुरारी का चित्र। कृष्ण का चित्र। तब मेरे समझ में आता है कि इतिहास और पौराणिक कथाओं को किताबों के चंद तहरीरों में बंद करके साक्ष्य बनाया जा सकता हैं, या मिटाया जा सकता हैं। लेकिन उन आस्थाओं का क्या प्रमाण हो सकता है, जो लोगों के रगों में लहू की तरह प्रवाहित होती हैं? आँखों में बिजली की तरह चमकती हैं। कृष्ण भी तो एक आस्था का ही नाम है। एक विश्वास का ही नाम है। भगवान श्रीकृष्ण का लीलामय जीवन अनके प्रेरणाओं व मार्गदर्शन से भरा हुआ है। उन्हें पूर्ण पुरुष लीला अवतार कहा...