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Showing posts from April, 2020

राष्ट्रीय एकता

भारत एक विशाल भूमि का प्रदेश है जिसमें विभिन्न समुदायों, संस्कृतियों और जातियों के लोग रहते हैं। यहाँ सभी प्रांतों के लोगों का एकसाथ रहना लगभग असंभव सा लगता है और इन धार्मिक और सांस्कृतिक मतभेदों के कारण ही हमारा देश अतीत में अंग्रेजों का गुलाम बन गया था। आज जब हमारा देश स्वतंत्र है तो हमारी पहली और सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बाहरी खतरों और आंतरिक असंतोष से इसकी अखंडता और सम्मान को संरक्षित करने की है। राष्ट्रीय एकता न केवल एक मजबूत देश के गठन में मदद करती है बल्कि अपने लोगों के विकास को भी प्रोत्साहित करती है। भारत में 19 नवंबर से 25 नवंबर तक आम जनता के हित में जागरूकता बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय एकता सप्ताह के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय एकता के विचार ने सामाजिक और धार्मिक मतभेदों को नष्ट करने का कार्य भी किया है। इसलिए यदि हमारे देश के लोग एकता के साथ खड़े रहे तो कई सामाजिक मुद्दों को समाप्त किया जा सकता है। विभिन्न विश्वासों को मानने वाले और विभिन्न समुदायों के लोग जो दूसरों के धर्मों से अपने धर्म को अच्छा बताते थे धीरे-धीरे एकता के महत्व को महसूस कर रहे हैं और देश की एकता और सम्...

भ्रष्टाचार

हमारे देश के गठन के बाद से सब कुछ राजनीतिक नेताओं और सरकारी क्षेत्रों में शासन करने वालों द्वारा तय होता है। जाहिर है हम एक लोकतांत्रिक देश हैं लेकिन जो भी सत्ता में आ जाता है वह उस शक्ति का दुरुपयोग करके अपने निजी लाभ के लिए धन और संपत्ति हासिल करने की कोशिश करता है। आम लोग खुद को हमेशा अभाव की स्थिति में पाते हैं। हमारे देश में अमीर और गरीब के बीच का अंतर इतना बढ़ गया है कि यह हमारे देश में भ्रष्टाचार का एक स्पष्ट उदाहरण है जहां समाज के एक वर्ग के पास समृद्धि और धन है और वहीँ दूसरी तरफ अधिकांश जनता गरीबी रेखा से नीचे रहती है। यही कारण है कि कुछ देशों की अर्थव्यवस्था को गिरावट का सामना करना पड़ रहा है. यदि हम अपने देश के जिम्मेदार नागरिक हैं तो हमें यह समझना चाहिए कि यह भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्र के आर्थिक विकास में खाई है और हमारे समाज में अपराध को जन्म दे रहा है। यदि हमारे समाज का बहुसंख्यक वर्ग अभाव और गरीबी में रहना जारी रखेगा और किसी भी रोजगार का अवसर नहीं मिलेगा तो अपराध दर कभी कम नहीं होगी। गरीबी लोगों की नैतिकता और मूल्यों को नष्ट कर देगी जिससे लोगों के बीच नफरत में वृद्धि होगी। ...

देशभक्ति

हर गणतंत्र दिवस पर बचपन का एक किस्सा याद आता है. मेरी उम्र लगभग 5 या 6 साल की थी. पहली क्लास में एडमिशन हुए कुछ ही दिन हुए थे और साफ साफ बोलना बस सीखा ही था. गणतंत्र दिवस के अवसर पर सरस्वती शिशु शिक्षा मंदिर में एक कार्यक्रम चल रहा था जिसमें बच्चे जाकर कुछ कुछ सुना रहे थे और उन्हे इनाम मिल रहा था. मैं ये सब देख रहा था. मां ने मुझे कहा कि मैं भी वहां जाऊँ और जाकर कुछ सुनाऊँ. मैं ने पहले तो आनाकानी की लेकिन फिर इनाम के लालच में जाने के लिए तैयार हो गया. माँ ने मुझे उस दिन मेरी ज़िन्दगी की पहली कविता सिखाई. मैं वहां पहुंच गया. प्रबंधक मेरे पड़ोसी ही थे. कुछ देर में मेरा नंबर आ गया और मैं मंच पर था. सामने ढेरों लोग बैठे हुए थे. मैंने अपने हाथों पर कविता लिखी हुई थी, लेकिन हाथों को देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी. कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन फिर मुझे इनाम का ख्याल आया और मैंने कविता शुरू की.  "माँ मुझको बंदूक दिल दो,  मैं भी लड़ने जाऊंगा,  सरहद पर बन कर फौज़ी दुश्मन को मार भगाउँगा" इतना कहने के बाद तालियों की गड़गड़ाहट से सारा मैदान गूंज गया और मैं वहां सन्न सा खड...

शिक्षा का उद्देश्य

विद्यार्थी-जीवन की एक घटना भुलाए नहीं भूलती। हम दसवीं कक्षा में थे। हिंदी के अध्यापक ने शिक्षा के उद्देश्य पर एक लंबा-चौड़ा भाषण दिया। जिला विद्यालय निरीक्षक हमारे कॉलेज का निरीक्षण करनेवाले थे। गुरुजी ने घोषणा की कि कक्षा में जो छात्र शिक्षा के उद्देश्य पर सबसे अच्छा भाषण तैयार करके लाएगा, उसे पुरस्कृत किया जाएगा। सभी छात्र गुरुजी द्वारा बताए जा रहे शिक्षा के उद्देश्यों को नोट करने में व्यस्त थे। गुरुजी कह रहे थे कि शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य बच्चों को एक अच्छा शहरी, भविष्य का एक अच्छा इनसान बनाना है। उन्हें किस तरह समाज और व्यक्तिगत जीवन के बीच नैतिक आधार पर संतुलन स्थापित करना चाहिए तथा हर प्रकार के लोभ, लालच, क्रोध और घृणा की भावनाओं को त्यागकर अन्य लोगों की निस्स्वार्थ सेवा करनी चाहिए, बड़ों का सम्मान और छोटों को प्यार देना चाहिए। गुरुजी का भाषण समाप्त हुआ तो एक छात्र ने अपना हाथ उठाया। सभी को लगा, जैसे कक्षा भर में अकेला छात्र यही है, जिसने गुरुजी द्वारा दिए गए उपदेश को हाथोहाथ कंठस्थ कर लिया है। गुरुजी ने उसकी ओर देखकर संकेत किया— ‘हाँ बेटे! तुम समझे, शिक्षा का उद्देश्य?’ छात्...

कोरोना के बाद की दुनिया

कोरोना वायरस के प्रकोप से जूझ रही दुनिया के बारे में अगर इस वक्त कुछ अनिश्चय कायम हैं तो ऐसी कई नई संभावनाएं भी पैदा हो गई हैं, जिनसे विश्व में कई बदलावों की उम्मीद की जा रही है। अनिश्चय इसका है कि आखिर कैसे यह बीमारी काबू में आएगी और इसके कारण उलट-पुलट व्यवस्थाएं कितने दिनों तक इसी तरह अराजकता की शिकार रहेंगी। संभावनाओं की तरफ गौर करें तो प्रतीत होता है कि इस संक्रमण से संसार कई ऐसे सबक लेगा जो एक बेहतर दुनिया बनाने का भरोसा जगाएंगे और मानवता के वास्तविक प्रतिमान हमारे सामने रखेंगे। मानव व्यवहार और दिनचर्या : महामारियों के इतिहास को देखने से पता चलता है कि जब कोई रोग दुनिया के बड़े फलक पर फैलता है तो वह न केवल लोगों के रहन-सहन को पूरी तरह बदल देता है, बल्कि व्यापार, राजनीति और अर्थव्यवस्थाओं के संचालन के तौर- तरीकों पर भी नाटकीय असर डालता है। कोविड-19 नामक बीमारी यानी कोरोना वायरस के संक्रमण से जो पहली चीज बदलने वाली है, वह सामान्य मानव व्यवहार और हमारी दिनचर्या है। आज यह एक सामान्य मानव व्यवहार है कि लोग अपने घर-परिवार, मित्रों, सहयोगियों और सहयात्रियों के साथ ऐसी दूरी न बरतें, जैसे ...