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Showing posts from 2025

इस रात की सुबह नहीं होती

इस रात की सुबह नहीं होती दिन होता है रात भर रोशनी से चुंधियाई आँखें उबासियाँ लेकर खुलती हैं और बालकनी से सड़क पर युद्धक्षेत्र का आभास होता है रात के अनार आड़े पड़े देखते हैं लड़ियों ने जल कर कैसे फूल की पखुडियाँ बिखेरी हैं कुत्ते जो ना जाने कहाँ गायब रहे सारी रात दबे पाँव सूंघते हैं घटनास्थल को ज़्यादातर घरों में रौशनी की कतारें आखिरी घड़ी की तरह जलती-बुझती रात का धुंआ छत से ठीक ऊपर शामियाने सा, सूरज से कह रहा है थोड़ी देर बाद आना, घर में सब सो रहे हैं गेंदे की गंध में घी मिलाया है रात ने और चासनी तैर रही है नथुनों तक ड्राइंग रूम में रखे कृत्रिम फूलों को मुंह चिढाती इन गेंदों को बहते पानी में जाना है आज नहीं तो कल सारे सबूत मिटाए जाएंगे अपने बालों से बारूद की बू पटाखे के दुकान की रसीद सेंटर टेबल के नीचे की खाली बोतलें और किचन के सिंक में बर्तनों का पहाड़ रहेगी तो बस दरवाज़े पर रंगोली जब तक रहे, शुभ दीपावली का सिंथेटिक झालर जब तक टिके.

दीवाली की फुलझडियां

दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! धनतेरस में पैसे वाला चौदस में जो संयम टाला दीवाली में हुआ दिवाला हो गया बटुआ खाली रे दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! नकली घी की बनी मिठाई, नकली खोया और हलवाई ऊपर से इतनी महंगाई नोट भी निकले जाली रे दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! चीनी दिये और बाती चीनी लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति चीनी चीन ने रोज़ी-रोटी छीनी कितनों की की काली रे दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! दिलबर को हेलो हाई कहता, हैप्पी दीवाली आई कहता, अगर ना उसका भाई रहता लिए खड़ा दुनाली रे दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! कल की बात पे है वो स्थिर आज भी कभी होगा आखिर वस्ल की बात आई तो फिर उसने कल पर टाली रे दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! साकी सबको ही देता है, मयखाने का वो नेता है, बैठ नज़ारे क्या लेता है, आगे करो पियाली रे! दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! ज़्यादातर हैं वो अधिवक्ता बन बैठे हैं पार्टी प्रवक्ता बच्चा कोई सुन नहीं सकता बकते ऎसी गाली रे दीप जलाओ, दीप जलाओ, आज दीवाली रे! राजनीति की कथा अनंता सत्ता के सब हैं अभियंता आम आदमी फ़ूल है बनता एक फूल...

Corruption is essential for democracy ??

Corruption is essential for democracy because democracy requires elections and elections require unaccounted money to buy the ticket to contest and then votes to win.  Having said that, a reasonable limit would be appreciated. The ticket prices in Bihar have gone through the roof. If a candidate has to spend all his or her money on a ticket, how will one buy votes? Disgusting to see no price controls in a poor state of this low-income country. When will we have socialism in politics? Politicians pay lip service to socialism but when it comes to ticket pricing, they follow prohibitively exorbitant practices. This is extortion. If people spend so much wealth on just getting elected, they will be forced to swindle money from public works and extort from the people, who have to bear the cost of democracy.  I am not calling for cheap democracy. But cost moderation is essential. I request all stakeholders to sit down and by consensus make the process affordable for the rich and powe...